सोमवार, 9 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र ... सप्तम सर्ग .... भाग - 8 / रामधारी सिंह दिनकर


प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ----


माना  , इच्छित शांति तुम्हारी 
तुम्हें मिलेगी वन में
चरण चिह्न पर , कौन छोड़ 
जाओगे यहाँ भुवन में ? 

स्यात  दु:ख  से तुम्हें कहीं 
निर्जन में मिले किनारा 
शरण कहाँ पाएगा पर , यह 
दह्यमान   जग  सारा ।

और कहीं आदर्श तुम्हारा 
ग्रहण कर  नर- नारी 
तो फिर जाकर बसे विपिन में 
उखाड़ सृष्टि  यह सारी । 

बसी भूमि  मरघट बन जाये 
राजभवन हो सूना 
जिससे डरता यति , उसी का 
बन बन जाये नमूना । 

त्रिविध ताप में लगें वहाँ भी 
जलने यदि पुरवासी , 
तो फिर भागे उठा कमंडलु 
बन से  भी सन्यासी । 

धर्मराज , क्या यति भागता 
कभी गेह  या वन से ? 
सदा भागता फिरता है वह 
एक मात्र जीवन से । 

वह  चाहता सदैव मधुर रस , 
नहीं तिक्त  या लोना 
वह चाहता सदैव  प्राप्ति ही 
नहीं कभी कुछ खोना । 

प्रमुदित पा कर विजय , पराजय 
देख खिन्न  होता है 
हँसता देख  विकास , ह्रास को 
देख बहुत रोता है । 

रह सकता न तटस्थ,  खीझता,
रोता , अकुलाता है  , 
कहता , क्यों जीवन उसके 
अनुरूप न बन जाता है ।

लेकिन , जीवन जुड़ा हुआ है 
सुघर एक ढांचे  में 
अलग - अलग वह ढला करे 
किसके - किसके सांचें  में ?

यह अरण्य , झुरमुट  जो काटे ,
अपनी राह बना ले , 
क्रीतदास  यह नहीं किसी का 
जो चाहे , अपना ले । 

जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर , 
जो उससे डरते हैं 
वह उनका , जो चरण  रोप 
निर्भय  हो कर लड़ते हैं । 

यह पयोधि सबका  मुख करता 
विरत लवण - कटु  जल से 
देता सुधा उन्हें , जो मथते 
इसे मंदराचल  से । 

बिना चढ़े  फुनगी  पर जो 
चाहता सुधाफल  पाना 
पीना रस पीयूष , किन्तु 
यह मन्दर नहीं उठाना ।

खारा  कह जीवन - समुद्र को 
वही छोड़ देता है 
सुधा - सुरा - मणि - रत्न कोष से 
पीठ  फेर लेता है । 

भाग खड़ा  होता जीवन से 
स्यात  सोच यह मन में 
सुख का अक्षय कोष कहीं 
प्रक्षिप्त  पड़ा है वन में । 

जाते ही  वह जिसे प्राप्त कर 
सब कुछ पा जाएगा 
गेह नहीं छोड़ा कि देह धर 
फिर न कभी आएगा । 

जनाकीर्ण  जग से व्याकुल हो 
निकल भागना  वन में ;
धर्मराज , है घोर पराजय 
नर की  जीवन रण  में । 

यह निवृति है ग्लानि , पलायन 
का यह कुत्सित क्रम है 
नि: श्रेयस यह श्रमित , पराजित 
विजित  बुद्धि का भ्रम है । 

इसे दीखती मुक्ति रोर से , 
श्रवण मूँद  लेने में 
और दहन से परित्राण - पथ
पीठ  फेर देने में । 


6 टिप्‍पणियां:

  1. यह निवृति है ग्लानि , पलायन
    का यह कुत्सित क्रम है
    नि: श्रेयस यह श्रमित , पराजित
    विजित बुद्धि का भ्रम है
    सुन्दर..

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  2. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १०/७/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आप सादर आमंत्रित हैं |

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  3. दिनकर जी को संरक्षित करके आपने सब पे उपकार किया है

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  4. बहुत बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  5. ब्लॉग जगत के लिए यह एक धरोहर ही है। पूरी पुस्तक आपने लगा दिया।

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