सोमवार, 2 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र ..... सप्तम सर्ग .... भाग -7 / रामधारी सिंह दिनकर



प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ----

नृपति चाहिए जो कि  उन्हें 
पशुओं की  भांति चराए 
रखे अनय से दूर , नीति - नय 
पग -  पग  पर सिखलाये ।

नृप चाहिए नरों को , जो 
समझे उनकी नादानी 
रहे छींटता  पल - पल 
पारस्परिक  कलह पर पानी । 

नृप चाहिए , नहीं तो आपस 
में वे  खूब लड़ेंगे 
एक दूसरे के शोणित  में 
लड़ कर  डूब मरेंगे । 

राजतंत्र  द्योतक  है नर की 
मलिन निहीन  प्रकृति का 
मानवता की ग्लानि  और 
कुत्सित कलंक संस्कृति का ।

आया था यह प्रगति रोकने 
को केवल  दुर्गुण    की 
नहीं बांधने को सीमा 
उन्मुक्त पुरुष के गुण की । 

सो देखो, अब दिशा विचारों 
की भी निर्धारित है 
राज - नियम से परे कर्म क्या ,
चिंतन भी वारित है । 

कृष्ण हों कि  हों विदुर , नियोजित 
सब पर एक नियम है 
सब के मन , वच और कर्म पर 
अनुशासन का क्रम है । 

इनकी भी यदि क्रिया रही 
अनुकूल नहीं सत्ता के 
तो ये भी तृणवत नगण्य हैं 
सम्मुख  राज प्रथा के । 

जो कुछ है , उसका रक्षण ही 
ध्येय  एक शासन का ; 
नयी भूमि की ओर न बह 
सकता प्रवाह जीवन का । 

कहीं रूढ़ि - विपरीत बात 
कोई न बोल सकता है 
नया धर्म का भेद मुक्त 
हो कर न खोल सकता है । 

ग्रीवा पर दु : शील तंत्र को 
शिला भयानक धारे 
घूम रहा है मनुज जगत में 
अपना रूप बिसारे । 

अपना बस रख सका नहीं 
अविचल वह अपने मन पर , 
अत: बिताया एक खड्गधर
प्रहरी निज जीवन पर ।

और आज प्रहरी न देता 
उसे न हिलने- डुलने 
रूढ़ि बंध से परे मनुज का 
रूप निराला खुलने । 

किन्तु , स्वयं नर ने कु कृत्य  से 
संभव किया इसे है ,
आपस में लड़ - झगड़ उसी से 
आदर दिया इसे  है । 

जब तक स्वार्थ - शैल मानव के 
मन का चूर  न होगा 
तब तक नर-समाज से असिधर 
प्रहरी दूर न होगा । 

नर है विकृत अत: , नरपति 
चाहिए धर्म- ध्वज-  धारी 
राजतंत्र है हेय , इसीसे 
राज धर्म है भारी । 

धर्मराज , सन्यास खोजना 
कायरता है मन की 
है सच्चा  मनुजत्व ग्रंथियां 
सुलझाना  जीवन की । 

दुर्लभ नहीं मनुज के हित , 
निज वैयक्तिक सुख पाना 
किन्तु कठिन है कोटि - कोटि 
मनुजों को सुखी बनाना । 

एक पंथ है , छोड़ जगत को 
अपने में रम जाओ , 
खोजो  अपनी मुक्ति और 
निज को ही सुखी बनाओ । 

अपर पंथ है , औरों को भी 
निज - विवेक बल दे कर , 
पहुँचो  स्वर्ग - लोक  में जग से 
साथ बहुत को ले कर । 

जिस तप से तुम चाह रहे 
पाना केवल निज सुख को 
कर सकता है दूर वही तप 
अमित  नरों के दुख को । 

निज तप रखो चुरा निज हित ,
बोलो क्या न्याय यही है ? 
क्या समष्टि - हित मोक्ष  दान का 
उचित उपाय  यही है ? 

निज को ही देखो न युधिष्ठिर ! 
देखो निखिल भुवन को 
स्ववत शांति - सुख की ईहा में 
निरत , व्यग्र जन जन को । 


8 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रयास ....
    बहुत आभार संगीता दी ...!!

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  2. आज भी क्षुब्ध है एक कुरुक्षेत्र -समादृत कवि की कालजयी रचना

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  3. बहुत बहुत आभार |
    बढ़िया प्रस्तुति ||

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल के चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आकर चर्चामंच की शोभा बढायें

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  5. जब तक स्वार्थ - शैल मानव के
    मन का चूर न होगा
    तब तक नर-समाज से असिधर
    प्रहरी दूर न होगा ।
    वाह ....बहुत सुन्दर.

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  6. नृप चाहिए , नहीं तो आपस
    में वे खूब लड़ेंगे
    एक दूसरे के शोणित में
    लड़ कर डूब मरेंगे ।
    अंततोगत्वा यही होता आया है।

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