सोमवार, 23 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र ..... सर्ग - सप्तम .....--- भाग - 10



प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बांधवों  की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ---


यह विरक्ति निष्कर्म बुद्धि की 
ऐसी क्षिप्र  लहर है , 
एक बार जो उड़ा , लौट 
सकता न पुन:  वह घर है । 

यह अनित्य  कह - कह कर देती 
स्वाद हीन जीवन को 
निद्रा को जागृति  बताती 
जीवन अचल मरण को ।

सत्ता कहती अनस्तित्व को 
और लाभ खोने को ,
श्रेष्ठ  कर्म कहती निष्क्रियता , 
में विलीन  होने को । 

कहती सत्य उसे केवल , 
जो कुछ गोतीत , अलभ है 
मिथ्या कहती उस गोचर को 
जिसमें कर्म सुलभ  है । 

कर्म हीनता को पनपाती 
है विलाप के बल से 
काट गिराती जीवन के 
तरु को विराग के छल से । 

सह सकती  यह नहीं कर्म संकुल 
जग के कल - कल  को 
प्रशमित करती अत: , विविध विध
नर के दीप्त  अनल को । 

हर लेती आनंद - ह्रास 
कुसूमों का यह चुम्बन  से , 
और प्रगतिमय कंपन जीवित , 
चपल तुहिन  के कण से । 

शेष न रहते सबल गीत 
इसके विहंग के उर में , 
बजती नहीं बांसुरी  इसकी 
उदद्वेलन  के सुर में । 

पौधों से कहती यह , तुम मत 
बढ़ो , वृद्धि ही दुख है , 
आत्म नाश है मुक्ति महत्तम , 
मुरझाना ही सुख है । 

सुविकच , स्वस्थ , सुरम्य - सुमन को 
मरण भीति  दिखला कर , 
करती है  रस - भंग , काल का 
भोजन उसे बता कर । 

श्री , सौंदर्य , तेज , सुख 
सबसे हीन बना  देती है , 
यह विरक्ति मानव को दुर्बल , 
दीन बना देती है । 

नहीं  मात्र उत्साह - हरण 
करती नर के प्राणों से , 
लेती छीन प्रताप भुजा से 
और दीप्त बाणों  से । 

धर्मराज , किसको न ज्ञात  है 
यह कि अनित्य  जगत है 
जनमा  कौन , काल का जो नर 
हुआ नहीं अनुगत है ?

किन्तु , रहे पल - पल  अनियता 
ही जिस नर पर छाई 
नश्वरता  को छोड़ पड़े 
कुछ और नहीं दिखलाई । 

द्विधा मूढ़ वह कर्म योग से 
कैसे कर सकता  है 
कैसे हो सन्नद्ध जगत के 
रण  में  लड़ सकता  है ? 

तिरस्कार  कर वर्तमान 
जीवन के उदद्वेलन का 
करता रहता  ध्यान अहर्निश 
जो विद्रूप मरण का । 

अकर्मण्य वह पुरुष काम , 
किसके , कब आ सकता है ?
मिट्टी पर कैसे वह कोई 
कुसुम खिला सकता है ? ,



6 टिप्‍पणियां:

  1. कुरुक्षेत्र का हर सर्ग लाजवाब है।
    आपकी लगन और मेहनत को नमन!

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  2. बहुत सुन्दर.
    इतना इतना टाइप करके लगाना निरंतर..जय हो..

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  3. कुरुक्षेत्र प्रबंध काव्य की यह शृंखला जीवन के विविध पाठ पढ़ाती है।

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  4. सार्थक चिंतन का पाठ पढाती कविता। बधाई।

    ............
    International Bloggers Conference!

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  5. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन
    राग है, स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत
    में पंचम का प्रयोग भी किया है, जिससे
    इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.

    ..

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.
    .. वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों
    कि चहचाहट से मिलती है.

    ..
    Here is my homepage : संगीत

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