सोमवार, 25 जून 2012

कुरुक्षेत्र ... सप्तम सर्ग .... भाग -- 6 / रामधारी सिंह दिनकर


नहीं टूटती  तुझ पर सब के 
साथ विपद यह भारी , 
जाग मूढ़ , आगे के हित 
अब भी तो कर तैयारी । 

और , जगा , सचमुच मनुष्य 
पछतावे  से घबरा कर , 
लगा जोड़ने अपना  धन 
औरों की  आँख बचा कर । 

चला एक नर जिधर , उधर ही 
चले सभी नर - नारी , 
होने लगी आत्मरक्षा की 
अलग - अलग तैयारी  । 

 लोभ - नागिनी ने विष फूंका , 
शुरू हो गयी चोरी , 
लूट , मार , शोषण , प्रहार 
छीना - झपटी, बरजोरी । 

छिन्न - भिन्न हो गयी शृंखला 
नर - समाज की सारी , 
लगी डूबने  कोलाहल के 
बीच महि बेचारी  । 

तब आयी तलवार  शमित 
करने को जगद्दहन को 
सीमा में बांधने मनुज की 
नयी लोभ नागिन को । 

और खड्गधर पुरुष विक्रमी 
शासक बना मनुज का 
दण्ड- नीति - धारी त्रासक 
नर- तन में छिपे दनुज का । 

तज समष्टि को व्यष्टि चली थी 
निज को सुखी  बनाने , 
गिरि गहन  दासत्व - गर्त  के 
बीच स्वयं अनजाने । 

नर से नर का सहज प्रेम 
उठ जाता नहीं भुवन से , 
छल करने में सकुचाता यदि 
मनुज कहीं परिजन से । 

रहता यदि विश्वास एक में 
अचल दूसरे नर का 
निज सुख चिंतन में न भूलता 
वह यदि ध्यान अपर  का । 

रहता याद उसे यदि , वह कुछ 
और नहीं है , नर है 
विज्ञ वंशधर मनु का , पशु - 
पक्षी से योनि इतर है  । 

तो न मानता  कभी मनुज 
निज सुख गौरव  खोने में , 
किसी राजसत्ता  के सम्मुख 
विनत दास होने में । 

सह न सका  जो सहज - सुकोमल 
स्नेह सूत्र  का बंधन , 
दण्ड - नीति के कुलिश - पाश में 
अब है बद्ध वही जन । 

दे न सका  नर को नर जो 
सुख - भाग प्रीति से , नय से 
आज दे रहा वही भाग वह 
राज - खड्ड  के भय से । 

अवहेला कर  सत्य- न्याय के 
शीतल उद्दगारों की 
समझ रहा नर आज भली विध 
भाषा तलवारों की  । 

इससे बढ़ कर मनुज - वंश का  
और पतन क्या होगा ?
मानवीय गौरव का बोलो 
और हनन क्या होगा ? 

नर - समाज को एक खड्डधर 
नृपति चाहिए भारी , 
डरा  करें जिससे  मनुष्य 
अत्याचारी , अविचारी । 

नृपति चाहिए , क्योंकि परस्पर 
मनुज लड़ा करते हैं 
खड्ड चाहिए , क्योंकि  न्याय से 
वे न स्वयं डरते हैं । 


4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया एवं बहुत ही सार्थक रचना...दिनकर जी की इस उत्कृष्ट रचना को यहाँ पड़वाने के लिए आभार...

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  2. नर - समाज को एक खड्डधर
    नृपति चाहिए भारी ,
    डरा करें जिससे मनुष्य
    अत्याचारी , अविचारी ।
    परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं, कि आज इसकी बहुत ज़रूरत महसूस हो रही है।

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