सोमवार, 18 जून 2012

कुरुक्षेत्र ...सप्तम सर्ग ... भाग - 5 / रामधारी सिंह दिनकर



सहज - सुरक्षित रहता यह 
अधिकार कहीं मानव  का 
आज रूप कुछ और दूसरा 
ही होता इस भव  का । 

श्रम होता सबसे अमूल्य धन 
सब जन खूब कमाते 
सब अशंक रहते अभाव से 
सब इच्छित सुख पाते ।

राजा - प्रजा नहीं कुछ होता 
होते मात्र मनुज ही 
भाग्य - लेख होता न मनुज को 
होता कर्मठ भुज ही । 

कौन यहाँ राजा किसका है ?
किसकी कौन प्रजा है ? 
नर ने हो कर भ्रमित स्वयं ही 
यह बंधन सिरजा  है । 

बिना विघ्न  जल , अनिल सुलभ है 
आज सभी को जैसे 
कहते हैं , थी सुलभ भूमि भी 
कभी सभी को वैसे । 

नर नर का प्रेमी था मानव 
मानव का विश्वासी 
अपरिग्रह था नियम , लोग थे 
कर्म - लीन सन्यासी । 

बंधे धर्म के  बंधन में 
सब लोग जिया करते थे 
एक दूसरे  का दुख हँसकर 
बाँट लिया करते थे । 

उच्च- नीच का भेद नहीं था ;
जन - जन में समता  थी 
था कुटुम्ब -सा  जन - समाज , 
सब पर सबकी ममता  थी । 

जी भर करते काम , ज़रूरत भर 
सब जन थे खाते ,
नहीं कभी निज को औरों से 
थे विशिष्ट  बतलाते । 

सब थे बद्ध समष्टि - सूत्र  में ,
कोई छिन्न नहीं था 
किसी मनुज का सुख समाज के 
सुख से भिन्न  नहीं था । 

चिंता न थी किसी को कुछ 
निज - हित संचय  करने की , 
चुरा  ग्रास  मानव - समाज का 
अपना घर भरने की । 

राजा - प्रजा नहीं था कोई 
और नहीं शासन  था 
धर्म नीति का जन - जन के 
मन - मन पर अनुशासन  था । 

अब जो व्यक्ति -स्वत्व  रक्षित है 
दण्ड - नीति के कर से 
स्वयं समादृत  था वह पहले 
धर्म - निरत  नर नर से ।

ऋजु  था जीवन - पंथ , चतुर्दिक
थीं उन्मुक्त  दिशाएँ ,
पग - पग पर थीं अड़ी राज्य-
नियमों की नहीं शिलाएँ । 

अनायास अनुकूल लक्ष्य को 
मानव पा सकता था 
निज विकास की चरम भूमि  तक 
निर्भय  जा सकता था । 

तब बैठा कलि - भाव स्वार्थ बन 
कर मनुष्य के मन में 
लगा फैलने  गरल लोभ का 
छिपे छिपे जीवन में । 

पड़ा कभी दुष्काल , मरे नर ,
जीवित का मन डोला ,
उर के किसी निभृत कोने से 
लोभ मनुज का बोला । 

हाय , रखा होता संचित कर 
तूने  यदि कुछ  अपना 
इस संकट में आज नहीं 
पड़ता  यों  तुझे कलपना । 



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