गुरुवार, 29 मार्च 2012

देवता हैं नहीं

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nसुधीजनों को अनामिका का सादर प्रणाम !
बहुत दिनों बाद आना हुआ इसके लिए क्षमा याचक हूँ. चलिए आज आपके बीच एक नयी श्रृंखला की शुरुआत करती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि आप इसे पढ़ कर आनंदित होंगे.
आज से मैं हिंदी साहित्य के क्रांति कारी कवि श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' जी के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को  आपके साथ साझा करुँगी... जो बेहद मनोरंजक और पठनीय तो हैं ही साथ ही साथ 'दिनकर' जी के इन्द्र्धनुश्वरनी व्यक्तित्व की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं.....
File:Ramdhari Singh 'Dinkar'.JPG
रामधारी सिंह दिनकर जी  का जन्म (बंगाल और बिहार में प्रचलित फसली संवत ) के अश्विन मॉस में नवरात्र के भीतर बुधवार की रात में हुआ था. गणकों के अनुसार यह तिथि १९०८ के ३० सितम्बर को पड़ी थी. इनका  जन्म सिमरिया ग्राम में हुआ, जो मुंगेर जिले (अब बेगुसराय) में गंगा के उत्तरी तट पर अवस्थित है. 
दिनकर जी के पिता साधारण, अत्यंत साधारण स्थिति के किसान थे. उनका स्वर्गवास उस समय हो गया जब दिनकर जी मात्र दो साल के थे. दिनकर जी तीन भाइयों में से मंझले थे. इनका  लालन-पालन और शिक्षा - दीक्षा का प्रबंध इनकी विधवा माता ने किया. दिनकर जी की प्राथमिक शिक्षा गाँव में ही हुई, मैट्रिक की परीक्षा इन्होने गाँव के पास मोकामाघाट के हाई स्कूल से १९२८ में पास की और बी.ए. इन्होने पटना कालेज से १९३२ में किया. ये उस समय ग्रेजुएट हुए, जब आनर्स के साथ पास करने वाले मेधावी युवक आसानी से अच्छी नौकरियां प्राप्त कर  लेते थे. इनके भीतर कवित्व छात्र-जीवन में ही भली भांति स्फुटित हो चुका था, पर इनकी जिन्दगी इनके परिवार के नाम गिरवी हो चुकी थी.निर्धन परिवार ने पेट काटकर इन्हें पढाया था और आवश्यक था कि ये कमाकर उनकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ती करें. उन दिनों प्रतियोगी परीक्षाएं नहीं होती थी और डिप्टीगिरी खास कर उन्हें मिलती थी जिनकी मदद बड़े लोग करते थे. लेकिन इन बड़े लोगो ने दिनकर जी की ओर ध्यान नहीं दिया. निदान १९३३ में इन्होने एक नए हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक का पद कबूल कर लिया और ये व्यवस्थित परिवार की सेवा करने लगे.
'दिनकर' जी देखने में भारी-भरकम शरीर के स्वामी, गोरा-चिट्टा रंग, पांच फुट ग्यारह इंच लम्बाई वाले, बड़ी बड़ी आँखों वाले थे. जिनकी आंखे बात करते समय या कविता पाठ करते समय प्रदीप्त हो उठती थीं. ललकार भरी बुलंद आवाज़, तेज़ चाल और क्षिप्र बुद्धि - ये विशेषताएं थीं इनके व्यक्तित्व की. किसी भी परिस्थिति पर तुरंत ही प्रतिक्रिया करते थे. इनकी कविताओं में इनके व्यक्तित्व की आभा, स्वाभिमान और आत्मविश्वास की प्रबलता छलकती है और इनका आक्रमणकारी रूप सामने आता है. दिनकर जी की हर अंगभंगी यह ललकार कर कहती है - "दैवेन देयमिति कापुरुषाह वदन्ति" अर्थात जिसका मार्क्सवादी अनुवाद है - मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता है.
क्रमशः 
देवता हैं नहीं
देवता हैं नहीं,
तुम्हें दिखलाऊं कहाँ ?
सूना है सारा आसमान,
धुऐं में बेकार भरमाऊँ कहाँ ?
इसलिए कहता हूँ,
जहाँ भी मिले मौज ले लो !
जी चाहता हो तो टेनिस खेलो,
या बैठ कर घूमो कार में !
पार्कों के इर्द-गिर्द अथवा बाज़ार में,
या दोस्तों के साथ मारो गप्प !
सिगरट पियो !
तुम जिसे मौज मानते हो, उसी मौज में जियो !
मस्ती को धूम बन छाने दो,
उँगली पर पीला-पीला दाग पड़ जाने दो !
लेकिन, देवता हैं नहीं,
तुम्हारा जो जी चाहे करो !
फूलों पर लोटो,
या शराब के शीशे में डूब मारो !
मगर, मुझे अकेला छोड़ दो १
मैं अकेला ही रहूँगा !
और बातें जो मन पर बीतती हैं,
उन्हें अवश्य कहूँगा !
मसलन, इस कमरे में कौन है
जिसकी वजह से हवा ठंडी है,
चारों ओर छाई शांति मौन है.
कौन यह जादू करता है ?
मुझमे अकारण आनंद भरता है.
कौन है जो धीरे से
मेरे अंतर को छूता है ?
किसकी उँगलियों से
पीयूष यह चूता है ?
दिल की धडकनों को,
यह कौन सहलाता है ?
अमृत की लकीर के समान,
हृदय में यह कौन आता-जाता है ?
कौन है जो मेरे बिछावन की चादर को
इस तरह चिकना गया है,
उस शीतल, मुलायम समुद्र के समान,
बन गया है ?
जिसके किनारे, जब रात होती है,
मछलियाँ सपनाती हुई सोती हैं?
कौन है, जो मेरे थके पांवो को.
धीरे धीरे सहलाता और मलता है ?
इतनी देर कि थकन उतर जाए,
प्राण फिर नयी संजीवनी से भर जाए ?
अमृत में भीगा हुआ यह किसका,
अंचल हिलता है ?
पाँव में भी कमल का फूल खिलता है!
और विश्वास करो,
यहाँ न तो कोई औरत है, न मर्द;
मैं अकेला हूँ !
अकेलेपन की आभा जैसे-जैसे गहनाती है,
मुझे उन देवताओं के साथ नींद आ जाती है,
जो समझो तो है, समझो तो नहीं है;
अभी यहाँ हैं, अभी और कहीं हैं !
देवता सरोवर हैं, सर हैं, समुद्र हैं !
डूबना चाहो
तो जहाँ खोजो, वहीँ पानी है !
नहीं तो सब स्वप्न की कहानी है !
(आत्मा की आँखे से ली गयी कविता )

15 टिप्‍पणियां:

  1. राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत एवं सामाजिक पहलुओं को कविता के माध्यम से चित्रित करने वाले शांत,सौम्य एवं मानवीय संवेदना के अप्रतिम कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी सृजनशीलता में राष्‍ट्रीय एवं सामाजिक भावना के सम्‍बन्‍ध में स्‍वयं लिखा है ‘‘संस्‍कारों से मैं कला के सामाजिक पक्ष का प्रेमी अवश्‍य बन गया था, किन्‍तु मेरा मन भी चाहता था कि गर्जन तर्जन से दूर रहूँ और केवल ऐसी ही कवितायें लिखूँ जिनमें कोमलता और कल्‍पना का उभार हो। ...... और सुयश तो मुझे "हुंकार" से ही मिला, किन्‍तु आत्‍मा अब भी ‘रसवन्‍ती' में बसती है। राष्‍ट्रीयता मेरे व्‍यक्‍तित्‍व के भीतर से नहीं जाती। उसने बाहर से आकर मुझे आक्रांत किया है।' पर आगे चल कर उनके विचार एक अलग रूप में हमारे समक्ष उभर कर आते हैं जिसे उन्होंने स्वीकार करते हुए कहा है -

    "कामनाओं के झकोरें रोकते हैं राह मेरी,
    खींच लेती है तृषा पीछे पकड़ कर बांह मेरी।."

    अनामिका जी, इस प्रस्तुति के लिए मैं आपको तहे- दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ । धन्यवाद ।

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  2. "देवता ही तो है..."
    मन आनंदित हो गया दिनकर जी की कविता पढ़कर..... कितनी सहज... कितनी प्रभावी...
    दिनकर जी को उकेरती यह शृंखला बहुत ही ख़ास होगी....
    सादर आभार.

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  3. आभारी हूँ अनामिका जी....
    दिनकर जी के बारे में पढ़ा...उनको पढ़ा....
    आनंदित हूँ ...

    बहुत बहुत शुक्रिया.
    अनु

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  4. अति सुन्दर बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति...
    सार्थक
    दिनेश पारीक
    मेरी नई रचना
    कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: माँ की वजह से ही है आपका वजूद:
    http://vangaydinesh.blogspot.com/2012/03/blog-post_15.html?spref=bl

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  5. तो जहाँ खोजो, वहीँ पानी है !

    नहीं तो सब स्वप्न की कहानी है bahut accha lga dinkar jee ke bare me padhkar manoj jee....thanks nd aabhar.

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  6. देवता सरोवर हैं, सर हैं, समुद्र हैं !

    डूबना चाहो

    तो जहाँ खोजो, वहीँ पानी है !

    नहीं तो सब स्वप्न की कहानी है !
    kitni sunder baat hai........wah.

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  7. रामधारी सिंह दिनकर को पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है ... अच्छी प्रस्तुति

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  8. शौर्य और शृंगार दोनों का निखार है दिनकर का काव्य. और जीवन के सत्यों को मुखर करने में भी
    उनका कवि सचेत रहा है !

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  9. यह केवल ध्यानस्थ व्यक्ति का अनुभव हो सकता है। जिन खोजा तिन पाइयां,गहरे पानी पैठ।

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  10. दिनकर जी के बारे में इतनी जानकारी प्राप्त कर बहुत अच्छा लगा ! रचना भी बहुत सुन्दर है ! इस ज्ञानवर्धक श्रंखला को आरम्भ करने के लिए आपका धन्यवाद एवं शुभकामनाएं !

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  11. आभार अनामिका जी ...
    ज्ञानवर्धक श्रंखला है यह तो ...!बहुत प्रशस्त कार्य ...!!बहुत अच्छा लगा दिनकर जी के विषय में जान कर ..
    शुभकामनायें ...!!

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  12. अनामिका जी,
    सुबह मैं देख नही पाया । राम धारी सिंह दिनकर की जगह "रामधारी सिंह" दिनकर लिखें।

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  13. दिनकर जी से परिचय कराने के लिये आभार..

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